अंतरजाल पर देव बाबा का चिट्ठा…

हमारे समाज ने इंसानी फितरत को नापने का एक अनोखा थर्मामीटर ईजाद किया है। इस थर्मामीटर का नियम सीधा है, आप जितनी कर्कशता से किसी की आत्मा को छलनी करेंगे, आपका दिल गंगाजल जैसा उतना ही पवित्र माना जाएगा। वहीं दूसरी ओर, यदि आप किसी से तमीज से बात कर लें, तो समाज तुरंत माथे पर हाथ रखकर सोचने लगेगा, “यह मुस्कुरा क्यों रहा है? पक्का मेरी जमीन हड़पने की फिराक में है!”

यह एक ऐसा विचित्र नैतिक सर्कस है, जहाँ बदतमीजी को ‘साफगोई’ का स्वर्ण पदक दिया जाता है और शिष्टाचार को ‘चालाकी’ के कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।

हर नुक्कड़, दफ्तर और पारिवारिक मिलन समारोह में आपको एक-आध प्राणी ऐसे जरूर मिल जाएंगे, जो बातों के नाम पर केवल मौखिक मिसाइलें दागते हैं। वे आपकी नई पोशाक, आपके बच्चे के अंकों या आपकी किसी निजी विवशता पर ऐसा तीखा वार करेंगे कि आपकी आँखों में आंसू आ जाएं। लेकिन जैसे ही वे देखेंगे कि माहौल का ऑक्सीजन स्तर शून्य हो चुका है, वे अपनी जेब से समाज का सबसे आजमाया हुआ अचूक कवच निकाल लाएंगे—“भाई, मुझे घुमा-फिराकर बात करना नहीं आता, मैं तो जो है मुँह पर बोल देता हूँ… दिल में कुछ नहीं रखता!”

कमाल की दलील है! मानो उनका दिल कोई कूड़ेदान नहीं बल्कि खुला मैदान है, और दूसरों की भावनाएं वह सार्वजनिक डस्टबिन हैं जहाँ वे अपना सारा भाषाई कचरा बेझिझक उड़ेल सकते हैं। सवाल यह है कि यदि आपके पेट या दिल में जहर नहीं टिकता, तो इसका इलाज डॉक्टर से करवाने के बजाय आप दूसरों पर उल्टियां क्यों करते फिरते हैं? दिल का साफ़ होना कब से इस बात की गारंटी बन गया कि जबान पर लगाम लगाने की कोई जरूरत नहीं? मुँहजोरी और बदतमीजी को ‘सच्चाई’ का जामा पहनाकर बेचना हमारे समाज का सबसे बड़ा बौद्धिक घोटाला है।

और इस तमाशे की दूसरी कड़ी और भी हास्यास्पद है। मान लीजिए कोई व्यक्ति सभ्य है। वह अपनी बात शालीनता से रखता है, अपशब्द नहीं बोलता, दूसरों का सम्मान करता है और कटु सत्य को भी गरिमा के साथ कहने का सलीका जानता है। हमारे समाज की संशयवादी अदालत तुरंत अपना फैसला सुना देती है, “बड़ा मीठा बोलता है, जरूर कोई छुपा रुस्तम है। मीठी छुरी है बिल्कुल!”

यानी जब तक कोई आपके आत्मसम्मान पर दो-चार जूते सार्वजनिक रूप से न मारे, तब तक वह सच्चा इंसान नहीं लग सकता। अगर कोई शांति से, मुस्कुराकर पेश आ रहा है, तो हम यह मान ही नहीं पाते कि मनुष्य बिना किसी षड्यंत्र के भी भला हो सकता है। यह कैसी बीमार परिपाटी है जहाँ घाव देने वाले को ‘भोला और निष्कपट’ कहकर गले लगाया जाता है, और मरहम लगाने वाले को ‘शातिर’ कहकर संदेह की नजर से देखा जाता है?

सभ्यता का विकास शायद इसीलिए हुआ था ताकि मनुष्य अपनी पाशविक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण पाना सीखे। बोलना तो जानवर भी जानते हैं, चीखना, गुर्राना और डंक मारना प्रकृति का नियम हो सकता है, लेकिन सोच-समझकर, सामने वाले के स्वाभिमान का ख्याल रखकर बोलना केवल मनुष्य के हिस्से आया था। मगर हमारे बीच के ‘साफ दिल’ वाले शूरवीरों ने इस मानवीय गुण को ही कमजोरी मान लिया है।

सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि जब तक किसी व्यक्ति ने आपके साथ रत्ती भर भी बुरा न किया हो, केवल अपनी कल्पनाओं के आधार पर उसे ‘कपटी’ घोषित कर देना एक सामाजिक शगल बन चुका है। वह बेचारा दिन-रात अपनी शराफत की सजा भुगतता है, सिर्फ इसलिए क्योंकि उसने किसी का दिल दुखाने वाला कोई जुमला नहीं उछाला।

सच यह है कि कठोरता कोई बहादुरी नहीं, बल्कि संयम की कमी है। दिल का सच्चा वह नहीं होता जो अपनी जबान को बेलगाम छोड़ दे, बल्कि वह होता है जिसके भीतर इतनी करुणा हो कि वह सच बोलते हुए भी किसी को आहत न होने दे। अब वक्त आ गया है कि इस ‘दिल के साफ़’ वाले ढोंग का पर्दाफाश किया जाए। बदतमीजी को बदतमीजी कहा जाए, उसे सादगी का नाम देकर महिमामंडित करना बंद हो। और हाँ, मीठे बोल बोलने वालों को भी चैन की सांस लेने दी जाए—क्योंकि हर मुस्कुराता हुआ चेहरा षड्यंत्रकारी नहीं होता, कुछ लोग सिर्फ तमीजदार भी होते हैं।

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NewYorkerBihari

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