अंतरजाल पर देव बाबा का चिट्ठा…

सिनेमा जब जनमानस की चेतना को स्पर्श करता है, तो उसका प्रभाव केवल बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह भौगोलिक और सांस्कृतिक सीमाओं को लांघकर संवाद की नई जमीन तैयार करता है। हालिया फिल्म ‘हनुमान अंश’ को देखते हुए यह बात पूरी शिद्दत से महसूस होती है। फिल्म में जिस संजीदगी के साथ कुछ प्रसंगों को पर्दे पर उतारा गया है, वह निश्चय ही प्रभाव छोड़ता है। इसका सबसे स्पष्ट प्रमाण यह है कि कैंची धाम और बाबा नीम करौली जी को लेकर जो आस्था कभी मुख्य रूप से उत्तर भारत के एक हिस्से तक सीमित मानी जाती थी, उसकी गूंज अब दक्षिण, पश्चिम और देश के सुदूर कोनों में भी सुनाई देने लगी है। किसी कथा-शिल्प का इतना व्यापक विस्तार होना ही यह सिद्ध करता है कि कुल मिलाकर यह एक सार्थक और प्रभावशाली सिनेमाई प्रयास है।

किंतु, कला का यह प्रभाव मन के भीतर एक पुराने और गंभीर चिंतन को पुनः जाग्रत कर देता है, गुरु और संत परंपरा का वास्तविक स्वरूप क्या है, और आधुनिक मनुष्य के जीवन में उसकी क्या सार्थकता है?

भारतीय वांग्मय में संत परंपरा अत्यंत पावन और वंदनीय रही है। सांसारिक तृष्णाओं, पारिवारिक बंधनों और भौतिक सुखों के मोह को तिनके की तरह त्यागकर स्वयं को अनंत प्रभु भक्ति में विलीन कर देना कोई सामान्य बात नहीं है। यह वैराग्य अत्यंत कठिन साधना मांगता है। जो इस मार्ग पर चले, उन्होंने आत्म-साक्षात्कार की एक अनूठी ऊंचाई को छुआ।

फिर भी, जीवन और जगत को देखने का एक दूसरा दृष्टिकोण भी है, जो कर्म की प्रत्यक्ष धारा से जुड़ता है। मोह त्यागकर कंदराओं या आश्रमों में प्रभु को खोजना निःसंदेह दुष्कर है, किंतु समाज के भीतर रहकर, अपनी जिम्मेदारियों के भंवर में अपने सत्य को साधना उससे भी कम कठिन नहीं है। समाज की इस विशाल व्यवस्था को चलायमान रखना, अपने कर्म को निष्ठा से निभाना, दूसरों के दुख में भागीदार बनना और सांसारिक जटिलताओं के बीच भी अपने नैतिक विवेक को जीवित रखना, मेरे विचार से यह अधिक मूल्यवान और व्यावहारिक साधना है। यदि हर कोई विरक्त होकर अरण्य की ओर निकल जाए, तो उस समाज का पोषण कौन करेगा जिसकी नींव पर स्वयं संत परंपरा भी आश्रित रहती है? इसलिए, कर्मक्षेत्र में रहकर अपने स्वधर्म को जीना अपने आप में एक मौन तपस्या है।

रही बात इस रहस्य की कि क्या बाबा नीम करौली वास्तव में हनुमान जी के साक्षात अंश थे? क्या वे केवल एक सिद्ध संत थे या साक्षात दैवीय चेतना? बुद्धि और तर्क के पैमाने पर ऐसे प्रश्नों का कभी कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिल सकता। तर्क वहां समाप्त हो जाता है जहाँ भावना प्रधान हो, इसलिए, इस प्रश्न को किसी बौद्धिक बहस में घसीटने के बजाय भक्त और उसकी अगाध भक्ति पर छोड़ देना ही सबसे उचित और शालीन मार्ग है। जिसने जिस रूप में उस ऊर्जा को महसूस किया, उसके लिए वह सत्य उतना ही अखंड है। 

मैं स्वयं को इतना ज्ञानी या पारखी नहीं मानता कि आस्था और अवतार के इस गूढ़ रहस्य का कोई अंतिम निर्णय दे सकूं। हम जैसे साधारण संसारी मनुष्य केवल अपनी समझ और सीमित दृष्टि से जीवन को देखने का यत्न भर कर सकते हैं।

‘हनुमान अंश’ जैसी फिल्में हमें विस्मय और श्रद्धा के उस द्वार तक ले जाकर खड़ी कर देती हैं, जहां एक तरफ भावुक आस्था है और दूसरी तरफ कर्मठ जीवन का यथार्थ। दोनों के अपने-अपने सत्य हैं। शायद जीवन की पूर्णता इसी में है कि हम संतों के त्याग का आदर करें, भक्त की श्रद्धा का सम्मान करें, और स्वयं अपने हिस्से के कर्मक्षेत्र में उतरकर अपने सत्य को पूरी ईमानदारी के साथ जीते रहें।

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NewYorkerBihari

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