आज जब भी ‘कर्मयोग’ की बात आती है, हमारा ध्यान सीधे श्रीमद्भगवद्गीता के प्रसिद्ध श्लोक ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते…’ पर जाता है। लेकिन क्या कर्मयोग केवल गीता का एक स्वतंत्र उपदेश है, या इसकी जड़ें सनातन ज्ञान के मूल स्रोत—वेद और उपनिषदों (वेदान्त)—में गहराई तक समाई हुई हैं?
यदि कर्मयोग को वेद और वेदान्त की कसौटी पर कसा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि गीता का कर्मयोग कोई नया दर्शन नहीं, बल्कि वैदिक परंपरा का ही तार्किक और व्यावहारिक चरमोत्कर्ष है।
वेदों के दो मुख्य भाग माने गए हैं: कर्मकाण्ड (संहिता व ब्राह्मण) और ज्ञानकाण्ड (उपनिषद्/वेदान्त)।
वैदिक काल में कर्म का अर्थ मुख्य रूप से ‘यज्ञ’, ‘कर्तव्य’ और ‘धर्मानुकूल आचरण’ था। वेदों का स्पष्ट मत है कि जीवन कर्म-शून्य नहीं हो सकता। ऋग्वेद से लेकर यजुर्वेद तक, संपूर्ण सृष्टि को ही एक विराट ‘यज्ञ’ माना गया है। प्रकृति का हर तत्व लगातार अपने धर्म का पालन कर रहा है।
वेदों ने मनुष्य को निष्क्रियता (अकर्मण्यता) का नहीं, बल्कि कर्तव्यपरायणता का संदेश दिया। परंतु आरंभिक वैदिक कर्मकाण्ड में अक्सर फल की आकांक्षा (स्वर्ग, ऐश्वर्य, संतति) प्रधान हो जाती थी। यहीं से वेदान्त के परिष्कार की आवश्यकता पड़ी।
वेदान्त यानी उपनिषदों ने कर्म के बाह्य स्वरूप को भीतर की चेतना से जोड़ा। उपनिषदों ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि कर्म केवल सकाम (फल की इच्छा से) किया जाए, तो वह मनुष्य को जन्म-मरण के चक्र में बांधता है:
“प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म।” (मुण्डकोपनिषद् १.२.७)
अर्थात: सकाम यज्ञ भवसागर पार नहीं करा सकतीं।
तो फिर समाधान क्या है? क्या कर्म का त्याग कर दिया जाए?
वेदान्त इसका उत्तर ईशावास्योपनिषद् के आरंभ में ही अत्यंत प्रामाणिक रूप से देता है:
“कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥” (ईशावास्योपनिषद् २)
अर्थात: इस संसार में कर्तव्य-कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करो। इसके अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग नहीं है जिससे कर्म मनुष्य को लिप्त न करे।
वेदान्त की पहली कसौटी है, ईशावास्यमिदं सर्वम् (सब कुछ उसी एक चेतना से व्याप्त है)। जब सब कुछ परमात्मा का है, तो कर्म का फल ‘मेरा’ कैसे हो सकता है? यहीं निष्काम कर्म का दार्शनिक आधार तैयार होता है।
जब हम कर्मयोग को वेदान्त की कसौटी पर परखते हैं, तो उसके तीन मूल तत्व उभर कर आते हैं:
अहंकार का विसर्जन (अहंकार-त्याग): वेदान्त कहता है कि ‘जीव’ केवल प्रकृति के गुणों के माध्यम से कर्म करता है, साक्षी आत्मा अकर्ता है। कर्मयोग सिखाता है कि “मैं कर रहा हूँ” के अहंकार को छोड़कर कर्म को प्रकृति या ईश्वर को समर्पित कर देना ही कर्म-बंधन से मुक्ति है।
समत्व भाव (द्वंद्वों से परे): वेदान्त का चरम सत्य ‘अद्वैत’ (अभेद) है। जब सब में एक ही आत्म-तत्व है, तो सफलता-विफलता, सुख-दुःख, लाभ-हानि में चित्त का विचलित होना अज्ञान है। इसी अद्वैत दृष्टि को व्यावहारिक जीवन में उतारना ‘समत्वं योग उच्यते’ कहलाता है।
लोकसंग्रह (समष्टि हित): वेदान्त में व्यष्टि (व्यक्ति) और समष्टि (समाज/सृष्टि) का भेद मिट जाता है। अतः कर्मयोगी केवल अपने स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि की व्यवस्था और संतुलन (लोकसंग्रह) के लिए कर्म करता है।
वेद जहां कर्म की शक्ति और अनिवार्यता का प्रतिपादन करते हैं, वहीं वेदान्त उस कर्म को शुद्ध ज्ञान और आत्म-भाव की दिशा देता है। अतः वेदान्त की कसौटी पर कर्मयोग कोई पलायनवाद नहीं है, न ही यह सांसारिक भागदौड़ है। कर्मयोग वह साधना है जिसमें हाथ संसार के कर्तव्यों में लगे रहते हैं और बुद्धि परमात्मा (आत्म-तत्व) में प्रतिष्ठित रहती है। कर्म से ज्ञान की ओर और ज्ञान से निष्काम कर्म की ओर लौटना ही वैदिक जीवन-दर्शन का सार है।





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