-
Continue reading →: बदतमीज़ी बनाम शराफत का ढोंग?हमारे समाज ने इंसानी फितरत को नापने का एक अनोखा थर्मामीटर ईजाद किया है। इस थर्मामीटर का नियम सीधा है, आप जितनी कर्कशता से किसी की आत्मा को छलनी करेंगे, आपका दिल गंगाजल जैसा उतना ही पवित्र माना जाएगा। वहीं दूसरी ओर, यदि आप किसी से तमीज से बात कर…
-
Continue reading →: वेद और वेदान्त की कसौटी पर कर्मयोग का सिद्धांतआज जब भी ‘कर्मयोग’ की बात आती है, हमारा ध्यान सीधे श्रीमद्भगवद्गीता के प्रसिद्ध श्लोक ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते…’ पर जाता है। लेकिन क्या कर्मयोग केवल गीता का एक स्वतंत्र उपदेश है, या इसकी जड़ें सनातन ज्ञान के मूल स्रोत—वेद और उपनिषदों (वेदान्त)—में गहराई तक समाई हुई हैं? यदि कर्मयोग को वेद और…
-
Continue reading →: सिनेमा, संत परंपरा और कर्म का सनातन द्वंद्व: आस्था के पार जीवन का यथार्थ
सिनेमा जब जनमानस की चेतना को स्पर्श करता है, तो उसका प्रभाव केवल बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह भौगोलिक और सांस्कृतिक सीमाओं को लांघकर संवाद की नई जमीन तैयार करता है। हालिया फिल्म ‘हनुमान अंश’ को देखते हुए यह बात पूरी शिद्दत से महसूस होती…
-
Continue reading →: भद्रलोक के पाखण्डी बुद्धिजीवी!
लोकतंत्र में नायक बदलते रहते हैं, और नायकों के सत्ता से उतरते ही सबसे तेजी से बदलते हैं हमारे समाज के स्वघोषित “बुद्धिजीवियों” के सुर। पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों अवसरवादिता और बौद्धिक पाखंड का सबसे सटीक उदाहरण बनी हुई है। याद कीजिए पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजे! जब…
-
Continue reading →: व्यापारिक समझौतों का सप्ताह!इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की परिभाषा बदल रही है। पारंपरिक रूप से ‘व्यापार’ और ‘रणनीति’ को अलग-अलग देखा जाता था, लेकिन वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में ‘जियो-इकोनॉमिक्स’ (Geo-economics) ही विदेश नीति का केंद्र बन गया है। भारत द्वारा अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) के साथ किए जा रहे नवीनतम समझौते केवल आयात-निर्यात के आंकड़े नहीं हैं; ये…
-
Continue reading →: बसंत पंचमी: बदलाव और ज्ञान का प्रतीकदो दिन में बसन्त पञ्चमी है, अहा, सुन्दर और अच्छे दिन आने वाले हैं। प्रकृति अपनी पीली चादर ओढ़ती है और ठिठुरती हुई सर्दियों के बाद धूप में एक नई गरमाहट घुलने लगती है, तब हम बसंत पंचमी मनाते हैं। आम तौर पर हम इसे ‘ऋतुराज बसंत’ के आगमन और…
-
Continue reading →: गीता, कर्मयोग और कॉर्पोरेट लाइफश्रीमद्भगवद्गीता के कर्मयोग का सिद्धांत कहता है कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फल पर नहीं (कर्मण्येवाधिकारस्तेमाफलेषुकदाचन). आज के आधुनिक युग में यदि हम इस सिद्धांत की कसौटी पर मनुष्य की स्थिति का विश्लेषण करें, तो हमें एक गहरा द्वंद्व दिखाई देता है। कल एक अजीब विरोधाभास सुनने…
-
Continue reading →: स्थिरचित्त कैसे बनें – प्रथम प्रवचन
अयोध्या की सुबह थी। सूर्य की पहली किरणें महल की दीवारों पर पड़ रही थीं, पर भीतर कई हृदयों में अंधकार छाया था। राम के वनगमन का निर्णय पूरे राजमहल को जैसे भीतर से हिला चुका था। लेकिन संसार में सबसे बड़े वीर, जो सम्राट बनने जा रहे थे, वह…
-
Continue reading →: मकर संक्रांति: भारतीय सांस्कृतिक एकता का महाकुंभमकर संस्कृति, खगोलीय, भारतीय सभ्यता और संस्कृति
-
Continue reading →: हिंदू धर्म में स्वास्थ्य और चिकित्सा: एक समग्र दृष्टिकोण
हिंदू धर्म में ‘आरोग्य’ (स्वास्थ्य) को केवल बीमारी की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा के बीच का संतुलन माना गया है। आयुर्वेद: जीवन का विज्ञान आयुर्वेद को दुनिया की सबसे पुरानी चिकित्सा प्रणाली माना जाता है, जिसकी उत्पत्ति अथर्ववेद से हुई है। त्रिदोष सिद्धांत: आयुर्वेद के अनुसार, हमारा शरीर वात,…
