इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की परिभाषा बदल रही है। पारंपरिक रूप से ‘व्यापार’ और ‘रणनीति’ को अलग-अलग देखा जाता था, लेकिन वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में ‘जियो-इकोनॉमिक्स’ (Geo-economics) ही विदेश नीति का केंद्र बन गया है। भारत द्वारा अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) के साथ किए जा रहे नवीनतम समझौते केवल आयात-निर्यात के आंकड़े नहीं हैं; ये एक नई विश्व व्यवस्था के निर्माण की आधारशिला हैं। कोविड महामारी और उसके बाद आए रूस/यूक्रेन संकट ने यह सिद्ध किया दिया कि केवल ‘दक्षता’ (Efficiency) पर आधारित आपूर्ति श्रृंखलाएँ खतरनाक हो सकती हैं। दुनिया अब ‘डि-रिस्किंग’ (De-risking) और ‘फ्रेंड-शोरिंग’ (Friend-shoring) की ओर बढ़ रही है।
- पश्चिमी देश चीन पर अपनी अत्यधिक निर्भरता को कम करना चाहते हैं।
- एक विशाल बाजार, लोकतांत्रिक देश होने के कारण भारत, चीन का सबसे विश्वसनीय और शक्तिशाली विकल्प बनकर उभरा है।
भारत और अमेरिका के बीच हालिया समझौते, विशेष रूप से iCET (Initiative on Critical and Emerging Technology), दोनों देशों के संबंधों में एक ‘वाटरशेड मोमेंट’ (ऐतिहासिक मोड़) हैं। यह समझौता आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग,सेमीकंडक्टर और वायरलेस संचार जैसे क्षेत्रों को कवर करता है।
तकनीकी संप्रभुता: अमेरिका द्वारा भारत को GE F-414 जेट इंजन की तकनीक हस्तांतरित करने का निर्णय अभूतपूर्व है। यह भारत को रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाएगा और रूस पर ऐतिहासिक निर्भरता को कम करेगा।
भविष्य की चिंता: आधुनिक युद्ध डेटा और चिप्स पर लड़े जाएंगे। अमेरिका के साथ सेमीकंडक्टर और स्पेस में सहयोग भारत को भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों के लिए तैयार कर रहा है।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific) में चीन की आक्रामकता को संतुलित करने के लिए, अमेरिका को एक शक्तिशाली भारत की आवश्यकता है। यह साझेदारी भारत की नौसैनिक क्षमताओं को बढ़ाती है, जिससे हिंद महासागर में शक्ति संतुलन बना रहता है।
भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC): यूरोपीय संघ भारत का एक प्रमुख व्यापारिक भागीदार है, लेकिन अब यह संबंध ‘नियम-आधारित व्यवस्था’ और ‘कनेक्टिविटी’ पर केंद्रित हो गया है। जी-20 में घोषित यह कॉरिडोर आधुनिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक परियोजनाओं में से एक है।
- BRI का विकल्प: चीन की ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) अक्सर देशों को कर्ज के जाल में फंसाती है। इसके विपरीत, IMEC एक पारदर्शी और आर्थिक रूप से व्यवहार्य विकल्प है।
- ऊर्जा और डिजिटल पुल: यह कॉरिडोर केवल सामान नहीं ढोएगा, बल्कि इसमें बिजली के केबल और हाइड्रोजन पाइपलाइन भी शामिल होंगी, जो यूरोप की ऊर्जा सुरक्षा को भारत के साथ जोड़ेंगी।
व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद (TTC): अमेरिका के बाद भारत ही वह दूसरा देश है जिसके साथ EU ने TTC का गठन किया है। इसका उद्देश्य हरित प्रौद्योगिकी (Green Tech) और डिजिटल गवर्नेंस के मानक तय करना है। यह सुनिश्चित करता है कि भविष्य की तकनीक लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित हो, न कि सत्तावादी नियंत्रण पर।
भारत, अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच उभरते इस त्रिकोण के तीन प्रमुख सामरिक निहितार्थ हैं:
आपूर्ति श्रृंखला का लचीलापन (Supply Chain Resilience): पश्चिमी कंपनियों की ‘चाइना प्लस वन’ (China Plus One)रणनीति का सीधा लाभ भारत को मिल रहा है। एप्पल और माइक्रोन जैसी कंपनियों का भारत में निवेश यह दर्शाता है कि भारत वैश्विक विनिर्माण का नया केंद्र (Global Manufacturing Hub) बनने की राह पर है।
- बहुध्रुवीय विश्व (Multipolar World): भारत किसी एक गुट का पिछलग्गू बनने के बजाय अपनी ‘सामरिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) को बनाए हुए है। इन समझौतों के माध्यम से, भारत पश्चिमी जगत के साथ जुड़ तो रहा है, लेकिन एक बराबर के भागीदार के रूप में, न कि कनिष्ठ सहयोगी के रूप में।
- ग्लोबल साउथ की आवाज: इन समझौतों के साथ, भारत ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) और विकसित पश्चिम के बीच एक सेतु का काम कर रहा है। भारत यह सुनिश्चित कर रहा है कि जलवायु परिवर्तन और डिजिटल डिवाइड जैसे मुद्दों पर विकासशील देशों के हितों की अनदेखी न हो।





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