दो दिन में बसन्त पञ्चमी है, अहा, सुन्दर और अच्छे दिन आने वाले हैं। प्रकृति अपनी पीली चादर ओढ़ती है और ठिठुरती हुई सर्दियों के बाद धूप में एक नई गरमाहट घुलने लगती है, तब हम बसंत पंचमी मनाते हैं। आम तौर पर हम इसे ‘ऋतुराज बसंत’ के आगमन और विद्या की देवी माँ सरस्वती की पूजा के रूप में देखते हैं। लेकिन अगर हम थोड़ा ठहरकर सोचें, तो बसंत पंचमी केवल कैलेंडर की एक तारीख या पूजा की विधि नहीं है, यह जड़ता (Inertia) के टूटने और सृजन (Creation) के आरंभ होने का उत्सव है। बसंत पंचमी केवल ऋतुओं के बदलने का उत्सव नहीं है, बल्कि यह अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ने की एक यात्रा है। हमारे ऋषियों ने इस पर्व को केवल फूलों के खिलने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे ‘वागीश्वरी’ माँ सरस्वती की उपासना से जोड़कर इसे एक आध्यात्मिक ऊंचाई दी।
हम माँ सरस्वती की वंदना इस प्रसिद्ध श्लोक से करते हैं:
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता। या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना॥
जो कुन्द के फूल, चंद्रमा, और बर्फ के हार के समान श्वेत हैं, जो शुभ्र (सफेद) वस्त्र धारण करती हैं, जिनके हाथ वीणा से सुशोभित हैं और जो श्वेत कमल पर विराजमान हैं। यहाँ ‘श्वेत’ रंग केवल एक रंग नहीं, बल्कि सत्व गुण (पवित्रता और शांति) का प्रतीक है। आज की दुनिया में, जहाँ हमारा मन क्रोध, ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा के ‘रंगों’ से भरा हुआ है, माँ सरस्वती का श्वेत स्वरूप हमें सिखाता है कि सच्चा ज्ञान वहीं ठहरता है जहाँ मन शांत और विकार रहित हो। क्या हम अपने मन को इतना निर्मल बना सकते हैं कि नया कुछ साफ़ मन से सीख सकें?
वीणावरदण्डमण्डितकरा…
माँ के हाथों में वीणा जीवन के संतुलन (Balance) का सबसे बड़ा उदाहरण है। संगीत तभी निकलता है जब तार न तो बहुत ढीले हों और न ही बहुत कसे हुए। हमारा जीवन भी इसी वीणा की तरह है। यदि हम बहुत तनाव (Stress) में हैं, तो हम टूट जाएंगे, और यदि हम बहुत आलस्य में हैं, तो कोई सुर नहीं निकलेगा। बसंत पंचमी हमें ‘समत्व’ (Equanimity) सिखाती है, सफलता और विफलता के बीच संतुलन बनाकर जीवन जीने की कला।
माँ सरस्वती का वाहन ‘हंस’ है। संस्कृत सुभाषित में कहा गया है:
हंसः श्वेतो बकः श्वेतो को भेदः बकहंसयोः। नीरक्षीरविवेके तु हंसो हंसः बको बकः॥
हंस भी सफेद है और बगुला भी सफेद है, फिर दोनों में क्या अंतर है? अंतर यह है कि हंस में दूध और पानी को अलग करने (नीर-क्षीर विवेक) की क्षमता है, जो बगुले में नहीं। आज के ‘डिजिटल युग’ में यह संदेश सबसे ज्यादा प्रासंगिक है। हमारे पास सूचनाओं (Information) का भंडार है, लेकिन क्या हमारे पास यह विवेक है कि क्या सही है और क्या गलत? क्या ग्रहण करने योग्य है और क्या त्यागने योग्य? सच्ची शिक्षा वह नहीं जो हमें केवल तथ्यों को रटना सिखाए, बल्कि वह है जो हमें ‘हंस’ जैसी दृष्टि दे, ताकि हम झूठ और प्रपंच के बीच सत्य को पहचान सकें।
अंततः बसंत पंचमी की मूल भावना इस प्रार्थना में निहित है:
असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय॥
(मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो, मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।)
जैसे बसंत प्रकृति की जड़ता को तोड़कर उसमें नए प्राण फूंकता है, वैसे ही ज्ञान हमारे भीतर की रूढ़ियों और अंध-विश्वासों की बर्फ को पिघलाता है।
आज हम ‘सूचना युग’ (Information Age) में जी रहे हैं। हमारे पास हर सवाल का जवाब एक क्लिक पर मौजूद है। फिर भी, माँ सरस्वती की प्रासंगिकता आज पहले से कहीं अधिक है। माता सरस्वती केवल ‘एकेडमिक नॉलेज’ या किताबों की देवी नहीं हैं; वे ‘विवेक’ (Wisdom) की प्रतीक हैं।
ज्ञान का अंतिम उद्देश्य शोर मचाना नहीं, बल्कि जीवन में संगीत (सामंजस्य) पैदा करना और सादगी अपनाना है। आज हम सूचनाओं से भरे हैं, पर क्या हम ज्ञानी हैं? बसंत पंचमी हमें याद दिलाती है कि डेटा इकट्ठा करना ज्ञान नहीं है, उस डेटा का मानव कल्याण के लिए सही उपयोग करना ही असली सरस्वती पूजा है।
बसंत का सबसे बड़ा सबक प्रकृति खुद देती है। पेड़ों पर नई कोपलें तभी आती हैं जब वे पुराने, सूखे पत्तों को गिराने का साहस करते हैं। हम अक्सर अपने पुराने पूर्वाग्रहों, असफलताओं और बीती बातों को पकड़कर रखते हैं और फिर भी जीवन में ‘नएपन’ की उम्मीद करते हैं।
बसंत पंचमी एक मानसिक ‘रीसेट बटन’ है। यह हमें सिखाती है कि सृजन के लिए विसर्जन आवश्यक है। जब तक हम अपने मन के पतझड़ को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक विचारों का बसंत नहीं आएगा।





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