अंतरजाल पर देव बाबा का चिट्ठा…

गीता, कर्मयोग और कॉर्पोरेट लाइफ

श्रीमद्भगवद्गीता के कर्मयोग का सिद्धांत कहता है कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फल पर नहीं (कर्मण्येवाधिकारस्तेमाफलेषुकदाचन). आज के आधुनिक युग में यदि हम इस सिद्धांत की कसौटी पर मनुष्य की स्थिति का विश्लेषण करें, तो हमें एक गहरा द्वंद्व दिखाई देता है। कल एक अजीब विरोधाभास सुनने को मिला, एक सज्जन बोले कि कॉर्पोरेट लाइफ में तो सब कुछ रिजल्ट ओरिएंटेड हैं और यहाँ आपकी पोजीशन सिर्फ़ तब तक ही है जब तक आप कंपनी के लिए फायदेमंद हैं। यहाँ तो गीता का उपदेश फेल हो गया। दरअसल यहाँ कुछ बातें समझनी आवश्यक हैं। आज का मनुष्य कर्मयोग के सिद्धांत के व्यावहारिक प्रयोग के मामले में एक चौराहे पर खड़ा है। वह भौतिक रूप से बहुत सक्रिय है, लेकिन मानसिक रूप से फल की इच्छाओं के जाल में उलझा हुआ है। आधुनिक मनोविज्ञान भी अब गीता के उसी सिद्धांत की ओर लौट रहा है जहाँ ‘वर्तमान क्षण’ (Present Moment) में पूर्ण समर्पण के साथ कार्य करने को ही शांति और सफलता का मार्ग माना गया है।

भगवान कृष्ण ने कर्मयोग में ‘लोक-संग्रह’ (समाज का कल्याण) पर बल दिया है। इसकी व्याख्या करते हुए कृष्ण बताते हैं कि एक श्रेष्ठ व्यक्ति का कर्म समाज के लिए ‘रोल मॉडल’ कैसे बनता है:

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (3.21)

एक समाज का ‘श्रेष्ठ’ व्यक्ति (नेता, पिता, शिक्षक या सफल व्यक्तित्व) जो-जो आचरण करता है, अन्य सामान्य लोग भी वैसा ही आचरण करने लगते हैं।

  • वर्तमान स्थिति: आज मनुष्य अक्सर ‘स्व’ (Self) के लिए कर्म कर रहा है। उपभोक्तावादी संस्कृति (Consumerism) ने उसे केवल अपने उपभोग तक सीमित कर दिया है।
  • बदलाव: हालांकि, सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR), पर्यावरण संरक्षण और निस्वार्थ सेवा (Volunteering) के बढ़ते रुझान यह दर्शाते हैं कि मनुष्य पुनः निष्काम कर्म की ओर कदम बढ़ा रहा है।

आज के युग में, जिसे हम ‘सूचना और प्रतिस्पर्धा का युग’ कहते हैं, मनुष्य के पास सुख-सुविधाओं के साधन तो असीमित हैं, लेकिन मानसिक शांति और संतोष का अभाव है। ऐसे में श्रीमद्भगवद्गीता का कर्मयोग केवल एक धार्मिक सिद्धांत नहीं, बल्कि एक ‘मैनेजमेंट गाइड’ और ‘लाइफस्टाइल कोच’ के रूप में उभरता है।

आज के कॉर्पोरेट जगत और शिक्षा के क्षेत्र में सारा ध्यान ‘KPI’ (Key Performance Indicators) और ‘ग्रेड्स’ पर है। जब परिणाम हमारी अपेक्षा के अनुरूप नहीं होते, तो व्यक्ति डिप्रेशन या बर्नआउट का शिकार हो जाता है। अक्सर लोग कर्मयोग का अर्थ ‘बिना उद्देश्य के काम करना’ समझ लेते हैं, जबकि कृष्ण कहते हैं कि योग का अर्थ ही कर्म में कुशलता है। योग: कर्मसु कौशलम् (कार्य में कुशलता) – आज के प्रतिस्पर्धी युग में अपनी स्किल्स को लगातार अपग्रेड करना और पूर्ण एकाग्रता (Deep Work) के साथ कार्य करना ही वास्तविक कर्मयोग है। जब आप अपने कार्य में पूरी तरह डूब जाते हैं, तो वह कार्य ‘पूजा’ बन जाता है। हाँ लेकिन काम ऐसा कीजिए जिसमें आपकी रुचि हो। समत्वं योग उच्यते: – इमोशनल इंटेलिजेंस’ (EQ) के इस दौर में गीता का यह सिद्धांत हमें स्थिरप्रज्ञ (Emotionally Balanced) बनना सिखाता है, ताकि हम कठिन परिस्थितियों में भी सही निर्णय ले सकें। गीता हमें ‘अनासक्ति’ सिखाती है। इसका अर्थ कार्य न करना नहीं, बल्कि कार्य से इस तरह जुड़ना है कि असफलता हमें तोड़ न सके और सफलता हमें अहंकारी न बना दे। यह नजरिया हमें एक स्वस्थ वर्क-लाइफ बैलेंस बनाए रखने में मदद करता है। आधुनिक जीवन में गीता के कर्मयोग की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि यह हमें ‘Fear-based Motivation’ (डर से प्रेरित कार्य) के बजाय ‘Value-based Action’ (मूल्यों पर आधारित कार्य) की ओर ले जाता है। यह हमें सिखाता है कि हम मशीन नहीं, बल्कि चेतन प्राणी हैं जिनका प्रत्येक कर्म ब्रह्मांड की व्यवस्था में योगदान देता है।

“कर्मयोग का पालन करने वाला व्यक्ति भीड़ में रहकर भी अकेला (शांत) रह सकता है और अकेले रहकर भी समस्त संसार से जुड़ा रह सकता है।”

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NewYorkerBihari

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