अयोध्या की सुबह थी। सूर्य की पहली किरणें महल की दीवारों पर पड़ रही थीं, पर भीतर कई हृदयों में अंधकार छाया था। राम के वनगमन का निर्णय पूरे राजमहल को जैसे भीतर से हिला चुका था। लेकिन संसार में सबसे बड़े वीर, जो सम्राट बनने जा रहे थे, वह स्थिर चित्त थे। उन्हें ना संसार का मोह था, और ना ही किसी राजपाठ के वैभव की कोई आकांक्षा। उन्हें तो बस पिता के वचनों का पालन करना था, उन्होंने ना तो कोई द्रोह किया, बस प्रणाम किए और निकल गए। बाबा तुलसी लिखते हैं कि भगवान ने अयोध्या छोड़ते समय बंधुओं, अयोध्या के नगर वासियों को कहा कि मेरा हितकारी मित्र वही होगा, जिसकी चेष्टा से महाराज सुखी रहें, आप लोग सब वही उपाय कीजिएगा, जिससे मेरी सब माताएँ मेरे विरह के दुःख से दुःखी न हों।
सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत।
बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत॥बारहिं बार जोरि जुग पानी। कहत रामु सब सन मृदु बानी॥
सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जेहि तें रहै भुआल सुखारी॥मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन।
सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन॥एहि बिधि राम सबहि समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा॥
गनपति गौरि गिरीसु मनाई। चले असीस पाइ रघुराई॥
भगवान की यह लीला एक उदाहरण है, आजकल तो वैसे भी लोग छोटी छोटी समस्या पर चिढ़ जाते हैं, थोड़ा भी मामला इधर उधर हो तो लोग विचलित हो जाते हैं। अपनी ही समस्या को दुनिया में सबसे बड़ा मानना, और दूसरों की हर स्थिति को नज़रअंदाज़ कर देना भी गलत है। एक प्रश्न बार बार आता है कि क्या किया जाए कि चित्त स्थिर रहे, क्रोध की भावना न आए या उग्र भावना पर नियंत्रण रहे। सांख्य दर्शन और भगवद्गीता के अनुसार, हर मनुष्य का व्यवहार इन तीन गुणों के मिश्रण से तय होता है: सत्व गुण (Purity), रज गुण (Passion) और तम गुण (Ignorance)।
श्रीमद्भगवद्गीता के 14वें अध्याय (गुणत्रयविभाग योग) में भगवान कृष्ण ने त्रिगुणात्मक स्वभाव का बहुत विस्तार से वर्णन किया है। इस विषय पर सबसे मुख्य श्लोक, जो तीनों गुणों की परिभाषा और उनके बांधने के स्वभाव को बताता है, वह अध्याय 14 का 5वां श्लोक है:
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः। निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥
हे महाबाहो (अर्जुन)! सत्त्व गुण, रजोगुण और तमोगुण, प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण इस अविनाशी जीवात्मा को शरीर में विद्यमान होते हैं।
1. सत्त्व गुण (Purity):
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्। सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥ (14.6) अर्थ: सत्त्व गुण निर्मल होने के कारण प्रकाश करने वाला और विकाररहित है। यह सुख और ज्ञान के अभिमान से जीवात्मा को बाँधता है।
2. रज गुण (Passion):
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्। तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्॥ (14.7) अर्थ: रजोगुण को रागरूप और तृष्णा (कामना) से उत्पन्न जान। यह कर्मों और उनके फलों के आसक्ति से जीवात्मा को बाँधता है।
3. तम गुण (Ignorance):
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्। प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत॥ (14.8) अर्थ: तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न होता है और सभी देहधारियों को मोहित करने वाला है। यह प्रमाद (व्यर्थ की चेष्टा), आलस्य और निद्रा द्वारा आत्मा को बाँधता है।
भगवान कृष्ण ने एक ही श्लोक में इन तीनों का निचोड़ इस प्रकार दिया है:
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत। ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत॥
- अर्थात्: सत्त्व गुण सुख में लगाता है, रजोगुण कर्म में लगाता है, और तमोगुण ज्ञान को ढककर प्रमाद (पागलपन या आलस्य) में लगाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता के 14वें अध्याय में जब अर्जुन सुनते हैं कि ये तीनों गुण (सत्व, रज, तम) मनुष्य को बांध लेते हैं, तब वे प्रश्न करते हैं कि इन गुणों से छूटने के लक्षण क्या हैं और इसका उपाय क्या है? भगवान कृष्ण ने ‘गुणातीत’ (गुणों से अतीत या ऊपर उठा हुआ) बनने के लिए जो मार्ग बताया है, वह अत्यंत व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक है।
भगवान कृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति गुणों से ऊपर उठ जाता है, वह गुणों के कार्य (प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह) होने पर न तो उनसे द्वेष करता है और न ही उनके हट जाने पर उनकी आकांक्षा करता है।
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते। गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥ (14.23)
अर्थ: जो उदासीन (साक्षी) की भाँति स्थित रहता है और गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता। वह जानता है कि “केवल गुण ही गुणों में बरत रहे हैं” (इन्द्रियाँ ही अपने विषयों में लगी हैं, मैं आत्मा अकर्ता हूँ), ऐसा मानकर जो स्थिर रहता है, वही गुणातीत है।
यहाँ ध्यान रहे कि उदासीन होना, अवसाद ग्रस्त होने की स्थिति नहीं है, बल्कि यह ऐसी स्थिति जहाँ स्थिति के परिवर्तन से विचलित होने की स्थिति न हो, जिसे कहते हैं ना फ़र्क़ ना पड़े। वह कहते नहीं है कि उसने फलाने से यह कहा, वह कहा तो हम मुँह फुलाए बैठे हैं। यहाँ मन सब कुछ को देख अवश्य रहा है लेकिन उसे फ़र्क़ नहीं पड़ रहा।
हर्ष विषाद ज्ञान अज्ञाना। जीव धर्म अहँ मिति अभिमाना॥ परम धर्म श्रुति बिदित पुराना। बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना॥
बाबा तुलसीदास जी कहते हैं कि हर्ष, शोक, ज्ञान, अज्ञान, ये सब जीव के धर्म हैं। जो इनसे ऊपर उठ गया, वह उस ‘परम धर्म’ को प्राप्त कर लेता है जहाँ उसे बाहरी सुख-सुविधाओं की आवश्यकता नहीं रहती।
मिथिला के राजा महाराज जनक को बिदेह कहते हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि वह जीव जगत के समस्त सुखों को भोगने के बाद भी ईर्ष्या/द्वेष/स्वार्थ जैसे गुणों से बहुत दूर थे। उनका चित्त किसी ऋषि और मुनि के समान स्थिर था। जिसे देह का भी मोह ना हो। भगवान कृष्ण ने अर्जुन को समझाते हुए जनक जी को कर्मयोग का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण बताया है: “कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः। लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तु मर्हसि॥ (गीता ३.२०)” अर्थात्: जनक जैसे महापुरुषों ने केवल ‘निष्काम कर्म’ के द्वारा ही परम सिद्धि (विदेह अवस्था) प्राप्त की थी। अतः लोक-कल्याण को देखते हुए तुम्हें भी कर्म करना ही उचित है।
गीता में एक श्लोक है – तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्। जिसके लिए निंदा और प्रशंसा समान हैं, जो मौन रहता है और जो कुछ भी प्राप्त हो उसमें संतुष्ट है, और फिर मानस का पद – “सब कहँ मानप्रद आपु अमानी। भरत प्राण सम मम ते प्रानी॥” जहाँ भगवान राम कहते हैं कि जो दूसरों को सम्मान देता है पर स्वयं मान-सम्मान की इच्छा नहीं रखता, वह मुझे प्राणों के समान प्रिय है। गुणातीत व्यक्ति अपमान से दुखी नहीं होता क्योंकि उसके भीतर ‘अहं’ नहीं होता।
आजकल के समय में स्वस्थ प्रसन्न रहने का समाधान एक ही है, सरल और सहज रहिए। मन में कृतज्ञता, संतोष और परोपकार की भावना रखना। “परहित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥” का मंत्र समाधान की दिशा में एक उचित प्रयास होगा।
आज का प्रवचन यहीं समाप्त करते हैं, कल योग और अन्य आयामों पर चर्चा होगी।



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