मकर संक्रांति केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भारत की भौगोलिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक एकता का एक जीवंत सूत्र है। जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं या कहें कि उत्तरायण होते हैं तो पूरा भारत एक नए उत्साह से भर जाता है। यद्यपि इसके नाम और रीति-रिवाज अलग-अलग हैं, लेकिन इसके पीछे की भावना पूरे देश में एक समान है। यह त्यौहार तमाम भाषाओं, विविधताओं के बाद भी भारतीय सभ्यता की अखण्डता का जीवन्त दस्तावेज है।
खगोलीय और आध्यात्मिक महत्व: वैज्ञानिक दृष्टि से मकर संक्रांति वह समय है जब भगवान सूर्य उत्तर की ओर गमन (उत्तरायण) करना शुरू करते हैं। यह अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रतीक है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान और दान का विशेष महत्व है।
उत्तर से दक्षिण: विविध नाम, एक भाव। मकर संक्रांति भारत की ‘विविधता में एकता’ का सबसे सुंदर उदाहरण है।
उत्तर भारत (खिचड़ी/लोहड़ी): पंजाब और हरियाणा में इसे लोहड़ी के रूप में नई फसल और अग्नि की पूजा कर मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश और बिहार में इसे खिचड़ी कहते हैं, जहाँ तिल-गुड़ और उड़द की दाल का दान प्रमुख होता है।
दक्षिण भारत (पोंगल): तमिलनाडु में यह चार दिनों का उत्सव पोंगल है। यहाँ प्रकृति और पशुधन (बैलों) के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। कर्नाटक में इसे ‘सुग्गी’ के रूप में मनाया जाता है।
पूर्व भारत (बिहू/पौष संक्रांति): असम में इसे माघ बिहू या ‘भोगली बिहू’ कहते हैं, जहाँ सामुदायिक भोज और अग्नि (मेजी) का महत्व है। बंगाल में ‘गंगासागर’ स्नान और पीठा (विशेष मिठाई) का प्रचलन है।
पश्चिम भारत (उत्तरायण/मकर संक्रांति): गुजरात में यह उत्तरायण के रूप में मनाया जाता है, जहाँ आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से पट जाता है। महाराष्ट्र में ‘तिल-गुड़’ बांटते समय “तिल-गुड़ घ्या, गोड-गोड बोला” (तिल-गुड़ लो और मीठा बोलो) कहकर प्रेम का संदेश दिया जाता है।
कृषि और सामाजिक समरसता – यह त्योहार मूलतः कृषि उत्सव है। नई फसल के कटने की खुशी में किसान अपनी समृद्धि को समाज के साथ साझा करता है। तिल और गुड़ का प्रयोग इस ऋतु में स्वास्थ्य के लिए तो लाभकारी है ही, साथ ही यह संदेश भी देता है कि हमें तिल की तरह छोटा (विनम्र) और गुड़ की तरह मधुर होना चाहिए।
मकर संक्रांति के दिन कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक पूरा देश एक ही लय में स्पंदित होता है। यह दिन सिद्ध करता है कि भारत की आत्मा अपनी जड़ों से जुड़ी हुई है। भाषाएं अलग हो सकती हैं, खान-पान अलग हो सकता है, लेकिन सूर्य की वंदना और दान की परंपरा उत्तर और दक्षिण को एक अटूट धागे में पिरोती है।
मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति का वह दर्पण है जिसमें हमें हमारी प्राचीन सभ्यता के दर्शन होते हैं। यह त्योहार हमें सिखाता है कि परिवर्तन ही जीवन का नियम है और सूर्य की भांति हमें भी निरंतर प्रकाशमान रहना चाहिए। यह भारतीय एकता का वह विराट प्रदर्शन है, जो सदियों से हमारे देश को “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” बनाए हुए है।



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