आज लोहे के घर में मेरे सामने की सीट पर दो भारतीय बैठे हैं, उनमें से एक यहीं बसा हुआ है और दूसरा अभी कुछ समय पहले ही आया है। अजय भैया लिखे थे कि हमारी पीढ़ी वाला आदमी कहीं भी रहे, उसके दिल दिमाग का एक हिस्सा जहाँ रह जाता है उसे ही हम गाँव कहते हैं। वैसे यहाँ बसे हर आदमी में मन में यहाँ रहने, न रहने, या वापस चले जाने की जद्दोजहद हमेशा चलती रहती है। फिर दिन में पाँच डायरेक्ट फ्लाइट और देश से लगभग पंद्रह घंटे दूर न्युयॉर्क/न्युजर्सी में बसे हिंदुस्तानियों की स्थिति शायद किसी जमाने में गाँव घर से नौकरी के लिए दिल्ली, बंबई या बंगलौर में बसे हुए आदमी जैसी ही है।
बहरहाल यहाँ वापस लोहे के घर में नए/पुराने एनआरआई की चर्चा पर आते हैं, प्रिंसटन से न्युब्रनस्विक पार होते होते “बच्चे पाँव नहीं छूते”, “सम्मान नहीं करते”, यहाँ “घर लेना कितना कठिन है”, और “अब हिंदुस्तान पहले वाला हिंदुस्तान नहीं रहा” जैसे विषयों पर चर्चा हो चुकी है और नया एनआरआई बस सुन रहा है। वैसे मुझे लगता है मेडिकल सुविधाओं के अलावा कोई भी ऐसा कारण नहीं जहाँ भारत को अमेरिका से कम कहा जा सके। एडिसन पार हुआ और अब चर्चा स्कूल और कॉलेज पर आ चुकी है। स्कूल/कॉलेज का खर्चा, उसके बाद का भविष्य वगैरह पर चर्चा शुरू हुई है। अठारह या इक्कीस साल के होने जा रहे बच्चों के माता/पिता यदि वीजा पर अमेरिका में हों तो उनकी स्थिति ख़राब हो जाती है। उनके बच्चे फिर इंटरनेशनल स्टूडेंट वाली श्रेणी में आ जाते हैं और इसकी आगे की पढ़ाई या अमेरिका में स्टेटस कई फ़ैक्टर्स पर निर्भर करेगा। यहाँ नए एनआरआई के मन में शंका डाल दी गई है।
पीछे की सीट में एक महिला शायद अपनी माँ से बात कर रही है क्योंकि ठेठ हिन्दी में हो रही इन संवादों का लहजा बड़ा पारिवारिक है। शायद आज डिनर पर क्या बना है उसकी चर्चा है। यह महिला नेवर्क उतरने के लिए तैयार है, एयरपॉड लगाए इधर उधर से बेपरवाह/बिंदास एकदम।
अपने हिन्दुस्तानियों की चर्चा अब योग/साधना और मोदीजी पर आ गई है। आरएसएस क्या कर रही है, अमेरिका से लेकर दिल्ली तक, योग शिविर कैसे काम कर रहे हैं इत्यादि इत्यादि। बात चीत से इतना साफ़ है कि पुराना एनआरआई मोदीजी का भक्त है, और नया एनआरआई भी मोदीजी का ही वोटर है लेकिन थोड़ा चिढ़ा हुआ है। शायद यह लोग दिल्ली वाले हैं क्योंकि बार बार करोलबाग और चाँदनी चौक की बात निकाल रहे हैं। इतने साल अलग अलग आंदोलनों के कारण शहर जाम होने पर कमेंट – “अबे डरपोक लोग हैं, इनसे एक शहर मैनेज नहीं हुआ, देश क्या मैनेज करेंगे”। अभी के लिए पुराना एनआरआई चुप हो गया है। हाँ, लेकिन “आएगा तो मोदी ही” बोल कर नए ने पुराने को वापस चर्चा में वापस ला दिया है। “बहुत डेडिकेशन है”, “सड़कें, मेट्रो, एयरपोर्ट” हर जगह कुछ न कुछ काम चल रहा है, ऐसा सुनकर पुराने एनआरआई की प्रसन्नता लौट आयी है। मने अनेक विरोधाभासों के बाद मोदीजी ने सुलह करा दी है।
इनकी बक बक सुनते, टिपटिपाते, चाय की चुस्कियाँ लेते, नेवर्क आ गया है। यह न्युजर्सी का सबसे बड़ा जंक्शन है और यहाँ से हर दिशा की ट्रेन मिल जाती है। हम नार्थ-ईस्ट कॉरिडोर की इस ट्रेन से आगे न्युयॉर्क बढ़ चलेंगे। हमारे दोनों नए पुराने एनआरआई बंधु भी नेवर्क उतर गये हैं, बातचीत से लग रहा है कि यह लोग यहाँ से पाथ(पोर्ट अथॉरिटी ट्रांस हडसन) लेकर वर्ल्ड ट्रेड सेंटर जाएँगे।
नेवर्क के बाद ट्रेन में पसरे एक अजीब से सन्नाटे के साथ अब चाय पर ध्यान केंद्रित किया जाए। बाहर सूर्योदय होने को है, भोर की लालिमा दिख रही है। लोहे का घर अपने पड़ाव की ओर धीरे धीरे बढ़ रहा है।
न्युयॉर्क/न्युजर्सी के बीच ट्रांजिट लाइन हडसन नदी के नीचे और लगभग सौ वर्ष पुराने सुरंगों से जाता है, इस लाइन के सिग्नल हमेशा बिगड़ते हैं और सब कुछ ठीक होने के बाद भी पाँच दस मिनट हमेशा लेट होती ही हैं। सिग्नल गड़बड़ाएँ तो फिर तो घंटों लेट हो जाना भी सामान्य ही है। नए सुरंग का निर्माण कछुआ रफ़्तार से चल रहा है और शायद चार पाँच साल में पूरा हो जाए।
चलिए क़िस्सा-ए-ट्रांजिट ट्रेन के सुरंग में जाने के साथ ख़त्म किया जाए। बाबा देव अब अपना बस्ता पेटी सम्भालेंगे और फिर दिन भर कंप्यूटर पर खटखटाएँगे।
न्युयॉर्क.. न्युयॉर्क..
(न्युयॉर्कर बिहारी की डायरी, मार्च-१४ २०२४)


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