यह एक अजीब प्रश्न है, क्योंकि देश के बाहर हिन्दू धर्म के सबसे बड़े ध्वजवाहक स्वामी नारायण संप्रदाय के बड़े बड़े मंदिर हिन्दूधर्म के सहिष्णु, सर्वसमावेशी होने के हस्ताक्षर के समान हैं। सनातन हिन्दू धर्म में सदैव अनेक मत और सम्प्रदाय रहे हैं और ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के 164वें सूक्त की 46वीं ऋचा कहती है-
इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्य: स सुपर्णो गरुत्मान्।
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहु:॥
अर्थ यही हुआ – सत्य एक ही है, और सभी विद्वान सत्य को अलग अलग नाम से कहते हैं। हाँ लेकिन सनातन धर्म में अन्य अब्राहमिक धर्मों के समान पैगंबर नहीं होते सो स्वामी नारायण को महान माना जा सकता है लेकिन उन्हें भगवान नहीं कहा जा सकता है। एक बात और, इन भव्य मंदिरों में बड़ी बड़ी मूर्तियों में स्वामी नारायण और हिन्दू धर्म के मूल देवी/देवताओं की मूर्तियाँ छोटी छोटी। अदभुत कलाकृतिओं/नक़्क़ाशियों में सनातन देवी देवता, स्वामी नारायण के सामने करबद्ध से दिखते हैं। इन मंदिरों में देवों के विग्रहों की पूजा वैदिक विधि से नहीं होती, यहाँ घंटे, घड़ियाल नहीं बल्कि भगवान के सामने गुलदस्ते रखे होते हैं। इन मंदिरों में श्रीशक्ति, शिवतत्व या वैष्णवतत्व का अभाव दिखता है।
लेकिन इन मंदिरों का आवरण, स्वभाव, वैदिक ऋचाओं से अभिमंत्रित आभा, आध्यात्मिक वातावरण मन को विचित्र सी शान्ति देता है। मैं स्वामी नारायण के इन बड़े बड़े भवनों/संस्थानों को आध्यात्मिक केंद्र कह सकता हूँ, मंदिर नहीं। यहाँ आइये, बैठिए, चित्त की शांति के लिए अद्भुत माहौल है सो यहाँ बैठ मानस पाठ कीजिए बहुत आनंद आएगा।
॥सर्वे भवन्तु सुखिनः॥
🙏🙏


Leave a comment