जय जय श्री सीता राम। आज चहुँओर राम नाम की गूंज है। अयोध्या विश्व की सांस्कृतिक राजधानी सी प्रतीत हो रही है। हमारे जीवनकाल का सबसे बड़ा दिन कल बाईस जनवरी ही होगा। हर तरफ़ उमंग, उल्लास और प्रसन्नता है। प्रसन्नता कभी भी मौन नहीं होती, प्रसन्नता मानव कई भावों से प्रकट करता है सो ऐसे में थोड़ा बहुत शोर/हल्ला स्वाभाविक ही है। आज भारतीय समाज का हर घर मंदिर सा बन गया है, कुछ ही समय के लिए सही लेकिन लोगों ने आपस में ईर्ष्या का भाव त्याग अपना समय राम नाम को समर्पित किया है। हर चर्चा, विमर्श में राम हैं। यह सैंकड़ों वर्षों की गुलामी के कारण अपने इतिहास को भूल भटकी हुई जनता के पुनरोत्थान और जागरण का काल है। आज बीबीसी और टाइम में हिन्दू-राष्ट्रवाद पर विचित्र लेख पढ़े, आश्चर्य होता है कि आज के कालखण्ड में भी पश्चिम अपने पाखण्ड का प्रदर्शन इतने खुले तौर पर करता है। आज इस आनन्द और उल्लास के उत्सव के बीच इतिहास में मानवों पर सबसे अधिक अन्याय, अत्याचार करने वाले हमें राम मंदिर पर सही/गलत का ज्ञान दे रहे हैं। आज समय है उठने का, गलत को गलत कहने के साहस का, अन्याय और पीड़ा और गुलामी की मानसिकता से बाहर निकलने का। राम भारत की आत्मा हैं, राम ही राष्ट्र हैं। सनातन भारत युगों युगों से विद्यमान है, शास्वत है, जीवन्त है, जाग्रत है, भारत विश्व के हर मानव में विद्यमान ईश्वर तत्व की महत्ता समझता है इसीलिए हम वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा के साधक हैं। इस आनन्द और उल्लास में शान्ति के संदेश के साथ वैश्विक शान्ति और आध्यात्म पर ध्यान केंद्रित रखने का समय भी है।
श्रीराम मंदिर निर्माण, अयोध्याधाम में हो रही तैयारियाँ, उसको लेकर समाज घर परिवार में उत्साह, सब कुछ अभूतपूर्व है। जिस प्रकार हिन्दू संगठन, कार्यकर्ताओं ने हर घर श्री राम अक्षत पहुँचाने का अभियान चलाया हुआ है, उसका प्रभाव भी अभूतपूर्व होगा। जिस देश की आत्मा के कण कण में राम बसे हों वहाँ राम का महल बनना आनन्द का उत्सव है। बाबा तुलसी कहते हैं न – “जाके हृदयँ भगति जसि प्रीती। प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती॥” आज की यह स्थिति अलौकिक है, अभूतपूर्व है, अवर्णनीय है।
प्रत्येक संस्कृति में प्रतीक बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। हमारा ॐ, स्वस्तिक, धर्म पताकाएँ, भगवा ध्वज इत्यादि सनातन धर्म के कुछ विशिष्ट पहचान प्रतीक हैं। पश्चिम विश्व भारतीय स्वस्तिक चिन्ह को नाज़ी क्रॉस्ड-हुक के साम्य रखकर अकारण ही हिन्दुओं को अपराधी बनाता रहा है और, इसके विरोध में भारत की सरकार या हिन्दुओं ने कभी कठोर प्रतिकार नहीं किया। जिस प्रकार यहूदी अपने प्रति होने वाले अन्याय की गाथाओं को भूलने नहीं देते, उसके विपरीत हम उन क़िस्सों को भूले बैठे हैं। सैंकड़ों वर्षों की ग़ुलामी के कारण आज का हमारा आधुनिक इतिहास अन्यायी, अत्याचारी और लुटेरों की मज़ारों पर माथा टेकने जाने वाली सभ्यता वाला बन गया था। ऐसे कितने हिन्दू थे जो अयोध्याधाम में मंदिर के स्थान पर स्कूल/कॉलेज या अस्पताल की बातें कहते रहते थे? 2014 में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद देश का व्यवहार भी बदला है। लोगों ने प्रश्न पूछना और इतिहास खोदना शुरू किया, इसी मंथन के कारण आक्रान्ताओं से पीड़ित और विचित्र अपराधबोध से ग्रसित भारतीय सभ्यता ने अपने प्रतीक चिन्हों को समझना शुरू किया। समाज के भारतीयकरण की प्रक्रिया आरंभ हुई।
मोदी जी/ भाजपा/ लोकसभा चुनाव पर इसका प्रभाव: कभी कभी मुझे मोदीजी से ईर्ष्या होती है। इस अवस्था में इतनी ऊर्जा कहाँ से लाते हैं, शायद यह साधारण मानव के लिये कठिन हो सकता है लेकिन तपे हुए साधक के लिए नहीं। शायद मोदी शाकाहार और सात्विक जीवन की ऊर्जा के कारण अदभुत और असाधारण से काम बड़ी आसानी से कर लेते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि अयोध्याधाम में भव्य श्रीराम मंदिर निर्माण लोकसभा चुनाव को गम्भीर रूप से प्रभावित करेंगे। जनभावना को समझने में असफल, यथार्थ के धरातल से दूर और दिशाहीन विपक्ष अपनी मूर्खताओं के कारण मोदीजी से फिर पराजित होगा। मोदीजी की एक सफलता यह भी है कि वह प्रतीकों का सफलतापूर्ण इस्तेमाल करना जानते हैं। एक नई ट्रेन चलाने की सामान्य सी बात को भी देश के स्वाभिमान से जोड़ देते हैं। साधारण सी बोलचाल वाली शैली में भाषण, रोजमर्रा के विषयों को छूना उनके ऊपर अधिक से अधिक लोगों से जुड़ना, हमेशा व्यस्त रहना उन्हें प्रभावी प्रधानमंत्री बनाता है।
अंत में यही कहेंगे कि यह एक पड़ाव है, लक्ष्य अभी दूर है। काशी की मुक्ति अभी भी होना बाक़ी है, मथुरा का संघर्ष और भी कठिन है। लक्ष्य पूरा होने तक संघर्ष चलते रहना ही जीवंतता का प्रमाण है। उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥


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