आजकल बैंकों ने दुर्गंध मचाई हुई है। चारों तरफ़ स्टॉक मार्केट की उथल पुथल है, बड़े बड़े बैंक अस्थिर हैं और दुनिया को ज्ञान देने वाला अमेरिका अनेक समस्याओं से जूझ रहा है। यह सब कुछ आसानी से सम्भाला जा सकता था लेकिन कभी कभी सच में लगता है कि अमेरिकी सरकार ने जानबूझकर इसे इस स्थिति तक बिगड़ जाने दिया। सोचिए, वर्ष 2020, ट्रम्प सरकार थी, अमेरिका में मुद्रास्फीति अपने निम्नतम स्तर पर थी, लोगों के बैंक खातों में पैसा था, ब्याज दर बहुत कम थी और कोविड महामारी की असमंजस में लोग कुछ भी ख़रीदने में डर रहे थे। और एक आज की स्थिति, वर्ष 2023, मुद्रास्फीति अपने उच्चतम स्तर पर है, ब्याज दर इतिहास में सबसे अधिक है और लोगों की जेबें ख़ाली हैं। बीते तीन सालों की स्थिति अमेरिकी सरकार की दिशाहीनता और अमेरिकी विनियामक संगठनों की अकर्मण्यता की स्थिति का प्रदर्शन है। बाईडेन समर्थक और डेमोक्रेटिक पार्टी के बड़े दान देने वालों से सजी सिलिकॉन वैली बैंक को सरकार ने पहले मर जाने दिया और फिर हाथ घुमाकर कान पकड़ते हुए दूसरे हाथ से कोई और नाम से संजीवनी भी दे दिया। यही हाल सिग्नेचर बैंक का हुआ और फर्स्ट रिपब्लिक को तो ख़ैर बाक़ी बड़े बैंकों ने कोआपरेटिव संगठन बनाकर चंदा पकड़ा दिया। यह सब हुआ क्यों? आख़िर बैंक बवाल क्यों बन जाते हैं?
किसी भी देश के पास अपना बजट होता है, नागरिक सुविधाओं, सुरक्षा इत्यादि के लिए खर्च और फिर सरकारी आमदनी के लिये टैक्स – यह सब कुछ मूलभूत बुनियादी बातें हैं। यदि आप आमदनी से अधिक खर्च करेंगे तो क्या होगा? यही हाल बड़े बैंकों का भी है, किसी भी बैंक के पास खाताधारकों का पैसा आमदनी नहीं बल्कि एक ज़िम्मेदारी है, और उस पैसे को बाज़ार में निवेश करना और आय के नये साधन खोजना बैंक की आवश्यकता है। समस्या तब है जब यह बैंक पैसा कमाने के लिए किसी ऐसी व्यवस्था में निवेश कर बैठें जिसका मूल्य कम होता चला जाए। किसी भी देश के विकास का बैरोमीटर है उस देश की केंद्रीय बैंक द्वारा जारी बॉण्ड, जैसे आरबीआई अपने यहाँ बॉण्ड जारी करता है ठीक वैसे ही अमेरिकी सरकार का भी अपना बॉण्ड है। कोविड के बाद सिकुड़ती अर्थव्यवस्था, चीन और रुस से पिछड़ते हुए अमेरिका के बॉण्ड की ब्याज दर नीचे गिरी हैं। यही कारण है कि सबसे सुरक्षित कहे जाने वाले बॉण्ड मार्केट का डूब जाना वित्त बाज़ार के लिए संकट के काल का सूचक है। अपने बैंकों के घाटे को नज़रंदाज़ करना और समय रहते निर्णय न लेना विश्व के लिए कठिन सिद्ध होगा, और वोकत्व में डूबे अमेरिकी बैंकों की आदत सुधरती दिख नहीं रही। अमेरिकी बाज़ारों पर वैश्विक बाज़ारों की निर्भरता के कारण इसके परिणाम कठिन होंगे, लेकिन विकासशील देश इससे निकल जाएँगे। पश्चिमी देशों की तुलना में भारत कहीं बेहतर स्थिति में दिख रहा है। मुझे लगता है आने वाले समय में अमेरिका कठिनाई में है, बिखरी हुई अर्थव्यवस्था, हर ओर रायता फैलाने की आदत, विश्व के देशों में अशान्ति करवाने की आदत को सुधार ले तो अच्छा हो। और हाँ – भारत और चीन जल्दी ही विकसित देशों को चुनौती देते नज़र आएँगे, आने वाली सदी मेहनत और पुरुषार्थ पर चलने वालों के नाम ही होगी।


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