अंतरजाल पर देव बाबा का चिट्ठा…

तृषार की पुस्तक!

यह लड़का थोड़ा सा अलग है, अलग इसलिए कहे क्योंकि बहुत दिन बाद इसका लिखा हुआ बहुत अच्छा लगा। हर लेखक का प्रयास रहता है कि वह अपनी शैली बनाए, और जो सच में अपनी ख़ुद की शैली बना पाते हैं वह बहुत सफल होते हैं। ऐसे में तृषार की “प्रभास” सोमनाथ की ऐसी यात्रा पर आपको ले जाती है, जिसमें आप अनेक युगों की घटनाओं के साक्षी रहे सोमनाथ प्रभास क्षेत्र के दर्शन कर लेते हैं। इस पुस्तक की कहानी, अपने आप में उलझे हुए एक आधुनिक और प्रगतिशील जोड़े की प्रभास यात्रा से शुरू होती हुई, अनेक युगों से गुजरती है। इस प्रगतिशील जोड़े को अतीत में हो चुकी ऐसी घटनाओं का अनुभव होता है जिनकी कभी उन्होंने कल्पना भी न की थी। कई कालखण्डों में घटी ऐतेहासिक घटनाओं को एक ही कथा में पिरोने की यह लेखन कला अद्भुत है।

पुस्तक का पूरा विवरण तो नहीं देंगे, और पाठकों को हम भी किंडल पर या ऑनलाइन ऑर्डर कर पढ़ने के लिए ही कहेंगे लेकिन फिर भी अगर एक दो पैराग्राफ़ में लिखा जाए तो समझिए कुछ कहानियाँ हैं, एक में एक प्रगतिशील जोड़ा है, जो अपने आप में उलझा हुआ है, उसे अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए शायद थोड़ा समय और माहौल चाहिये। यह जोड़ा प्रभास क्षेत्र में घूमता है और वहाँ अतीत के शिलालेखों से मिलता है और कई अनसुनी कहानियों में अपने आप को देखता समझता हुआ अपनी समस्याओं से जूझने का साहस और अपने प्रेम का कारण और साधन पा जाता है। एक में एक मॉडर्न लड़की है, जो मंदिर जाना नहीं चाहती लेकिन उसका सामना इतिहास के ऐसी घटना से हो जाता है जिसके बाद उसका अभिमान चूर चूर हो जाता है। कुल छः अध्याय और पचहत्तर पन्नों में तृषार ने कई काल खंडों के दर्शन कराए हैं – दक्ष प्रजापति द्वारा शापित चंद्रमा के यज्ञ, सोमेश्वर महादेव ज्योतिर्लिंग स्थापना से लेकर भगवान कृष्ण को बहेलिये द्वारा बाण मारे जाने की घटना, फिर अनेक कालखंडों में भारतीय सभ्यता के प्रतिनिधि रहे इस मंदिर और प्रभास क्षेत्र की विशालता, भारतीय सभ्यता की अनोखी विरासत, ज्ञानियों विद्वानों के प्रतीकों और फिर आक्रमणकारियों द्वारा सोमनाथ मंदिर ध्वस्त किए जाने की घटनाएँ और वर्तमान में विशाल सोमनाथ मंदिर और प्रभास क्षेत्र तक की यात्रा का अनुभव अनोखा है।

इस पुस्तक में कुछ अनोखे पहलू हैं जो प्रभास क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए अनजान से ही हैं, मेरे एक मित्र जो वेरावल क्षेत्र में ही रहे हैं, अभी यहाँ एडिसन न्युजर्सी में रहते हैं लेकिन उनसे जब मैंने इस पुस्तक के क़िस्सों का ज़िक्र किया तो उन्होंने भी बड़ी कौतूहल वाली दृष्टि से देखा। उदाहरण के लिए – वाणस्तंभ का यह कहना कि “आसमुद्रान्त दक्षिण ध्रुव पर्यंत अबाधित ज्योतिर्मार्ग।” सुधाकर ने जब उस स्तंभ की दूसरी ओर देखा तो वहां इसका अंग्रेजी अनुवाद किया गया था ‘The light path stretching without obstruction unto the south pole over the end of the ocean.” इसका अर्थ यह हुआ कि छठी शताब्दी में हमें इस बात का ज्ञान था कि समुद्र के इस छोर के दक्षिण में दक्षिण ध्रुव है और वाण स्तंभ से दक्षिण ध्रुव तक कोई भूभाग नहीं है।

बर्बर आक्रांताओं के बारे में यह कहा जाना – “जो निर्माण नहीं कर सकते वह विनाश करते हैं। जिनकी आस्था के मूल में ही घृणा हो उनसे और अपेक्षा भी क्या की जा सकती है। सोमनाथ मंदिर की विराटता और इतिहास की पड़ताल करते हुए तृषार लिखते हैं – ““जब हम इस ज्योतिर्लिङ्ग के उल्लेख शिलालेखों में ढूंढते हैं तब भद्रकाली मंदिर के बारहवीं शताब्दी के शिलालेखानुसार हमें ज्ञात होता है कि सतयुग में सोम ने इस स्थान पर सुवर्ण के शिवालय का निर्माण कराया था, त्रेता में दशानन रावण द्वारा चांदी का, द्वापर में श्री कृष्ण द्वारा काष्ठ निर्मित और कलियुग में भीमदेव प्रथम द्वारा पाषाण का स्थापत्य निर्माण किया गया था।” “यदि हम इस ज्योतिर्लिङ्ग के नाम का मूल ढूंढें तो प्रभास खण्ड के अनुसार इस लिंग को ब्रह्मा के प्रथम कल्प में मृत्युंजय, द्वितीय में कृत्तिवास, तृतीय में अमृतेश, चतुर्थ में आपमय, पंचम कल्प में व्याघ्रचर्मवासा, छठे कल्प में भैरवेश्वर और सातवें कल्प में सोमनाथ कहा गया है।

अनेक विध्वंसों की गाथाओं की कहानियों के बाद अंग्रेजों के जाने के बाद स्वतंत्र भारत की चुनौतियों की भी थी। पुनर्निर्माण, स्वतंत्र देश में, परंतु अब क्या अड़चन आई? इस प्रश्न का सरल सत्य आज की पीढ़ियों से अनजान है। ““जूनागढ़ का स्वतंत्र भारत में विलय होना आज के इस भव्य सोमनाथ मंदिर के निर्माण की प्रथम सफलता थी।”, “अब तक विध्वंसक भी विदेशी थे और निर्माण में अड़ंगा डालने वाले भी विदेशी थे लेकिन इस बार वह कोई विदेशी नहीं थे, वह हमारे देश के माननीय प्रथम प्रधानमंत्री थे और यह स्वतंत्र भारत की करूणता ही थी।”। नेहरू सरकार के बड़े नेता चाहते थे कि सोमनाथ के पुनर्निर्माण में भारत सरकार का योगदान हो लेकिन प्रधानमंत्री इसके विरुद्ध थे। एक बार कैबिनेट बैठक के बाद नेहरू जी ने मुंशी जी को बुलाया और अपनी मंशा साफ करते हुए कहा “I don’t like your trying to restore Somnath. It is Hindu revivalism.” मुंशी जी ने प्रत्युत्तर में कहा “In its name, minorities are immune from such attention and have succeeded in getting their demands, however unreasonable, accepted.” “यह संवाद अब विवाद में बदल चुका था। जब सोमनाथ जीर्णोद्धार का संकल्प सरदार पटेल ने लिया था तभी से नेहरू और सरदार के बीच एक दरार का निर्माण हो चुका था।

नेहरूजी की इच्छा के विरुद्ध – देश के राष्ट्रपति जब सोमनाथ मंदिर जीर्णोद्धार के लिए प्रभास क्षेत्र पहुँचे तो उन्होंने कहा – “सोमनाथ मंदिर इस बात का परिचायक है कि पुनर्निर्माण की ताक़त हमेशा तबाही की ताक़त से ज़्यादा होती है।राष्ट्रपति महोदय का यह भाषण ऑल इंडिया रेडियो ने किनके आदेशों पर प्रसारित नहीं किया इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। राजेन्द्र बाबू ने आगे कहा- “जैसे विष्णु की नाभि में ब्रह्मा विद्यमान है वैसे ही हर मानव के हृदय में आस्था विद्यमान है और यही आस्था विश्व की हर शक्ति, हर आयु हर संपदा और हर सेना से अधिक शक्तिशाली है। पुराने दिनों में भारत समृद्धि का गढ़ था हमारे पास सोने-चांदी की अपूर्व संपदा थी जिसका अधिकांश भाग मंदिरों में था मुझे यह पूर्ण विश्वास है कि सोमनाथ का जीर्णोद्धार उसी समृद्धि का जीर्णोद्धार है।” “जो देश ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की संकल्पना पर चलता रहा है उसके सबसे बड़े स्थापत्य निर्माण में पूरे विश्व की प्रमुख नदियों का जल उपयोग किया जाना चाहिए। सनातन संस्कृति का मूल मंत्र और उद्देश्य भी विश्व कल्याण ही तो है। श्री राजेन्द्र प्रसाद ने अन्य देशों से जल मंगवाने का प्रस्ताव रखा लेकिन मंदिर निर्माण के शुरू से ही विरोधी रहे प्रधानमंत्री ने बैंकॉक के भारतीय राजदूत को पत्र लिखकर पूछा “यह पानी की शीशी और उसके बैंकॉक से भारत परिवहन का खर्च क्यों न आपसे ही वसूला जाए?” “जिस सभ्यता ने सहस्त्रों वर्षों तक आक्रमण झेले। जिस धर्म के करोड़ों वीरों ने आहुतियाँ दीं। जिस देश ने कभी किसी दूसरे देश पर आक्रमण नहीं किया, उसके करोड़ों नागरिकों को स्वतंत्रता के बाद भी अपने ध्वस्त हो चुके आस्था के प्रतीकों के पुनर्निर्माण में अपराध-बोध क्यों कराया जा रहा था? स्वतंत्रता के सत्तर साल बाद आज भी हमें ही दोषी ठहराया जाता है।‌ पीड़ितों को अपराधी ठहराने का यह उपक्रम किसी भी अन्य देश में नहीं है।

एक कहानी है “शिक्षित अशिक्षित” – इसमें एक मॉडर्न ख़्यालों वाली लड़की, मंदिर से दूर अपने माता/पिता से बग़ावती तेवर रखते हुए अनायास ही इतिहास के ऐसे पहलू का सामना करती है, कि उसकी पूरी शिक्षा और ज्ञान का अभिमान चूर चूर हो जाता है। शिक्षा यदि अध्यात्म और धार्मिक विरासत से दूर ले जाए तो वह कैसी यान्त्रिक परिणाम लाएगी सो ऐसे में नीति निर्धारण करने वाली धर्मपरक शिक्षा के व्यावहारिक पहलू को समझने के लिए यह अध्याय बेहद रोचक है।

बहरहाल – मेरा सभी से अनुरोध है, कि प्रभास की इस यात्रा को अवश्य करें। इस पुस्तक को अवश्य पढ़े। आज की चर्चा यहीं तक, फिर मिलते हैं एक नये विषय के साथ। तब तक के लिए जय राम जी की।

Leave a comment

NewYorkerBihari

देव बाबा के चिट्ठे पर आपका स्वागत है। हिन्दी ब्लॉगरी में पिछले लगभग दो अढाई दशक से किसी न किसी तरीके से जुड़ा रहा हूँ। बीच बीच में ब्रेक भी लिए हैं लेकिन ब्लॉगरी कभी छूटी नहीं.. इस बीच ब्लॉग का पता जरूर बदल गया है लेकिन याद रहे आदमी पुराना है! दुनिया के इस कोने से लेकर उस कोने तक, हम किसी भी विषय पर टिप्पणी कर सकते हैं! और हाँ, हमसे संपर्क करने के लिए केवल चाय ऑफर कीजिए, हम प्रकट हो जाएँगे।

Let’s connect