बचपन में सुने थे कि घर में महाभारत रखने से परिवार में कलह हो जाता है। सो हमारे घर में श्रीमद्भागवत, गीता, रामायण, सब थे लेकिन महाभारत कभी नहीं लाया गया। मुझे लगता है कि जिस प्रकार गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामायण को सरल जनमानस की भाषा अवधी भाषा में लिखकर रामकथा को घर घर पहुँचा दिया वैसा महाभारत के साथ न होना एक बड़ा कारण रहा होगा। ध्यान से देखा जाए तो महाभारत भारतीय सभ्यता की महानता और नारी की उत्तम स्थिति का एक जीता जागता दस्तावेज है। रामायण और महाभारत की कहानियाँ बच्चे बच्चे ने सुनी है और अनेकानेक बार इनकी व्याख्याएँ लिखी पढ़ी गई हैं। इसी क्रम में मित्र डॉक्टर पवन विजय जब इस पुस्तक को भेजे तो इसे पढ़कर कुछ सहज प्रतिक्रियाएँ मन में आयीं।
महाभारत के संदर्भ में एक प्रश्न सदा पूछा जाता है कि क्या यह युद्ध टाला जा सकता था? क्या कोई ऐसा व्यक्ति था, जो इस युद्ध को रोक सकता था? क्या भगवान कृष्ण इसे रोक सकते थे? क्या पाण्डवों द्वारा पाँच गाँवों की माँग पूर्ति होने से युद्ध रुक जाता? क्या देवव्रत का प्रण ही महाभारत युद्ध का कारण बना? क्या भाई भाई और उनके परिवारों के मध्य पारस्परिक ईर्ष्या और द्वेष से यह युद्ध हुआ? क्या द्रौपदी के अपमान के प्रतिशोध ने इस युद्ध की नींव रखी? इन प्रश्नों पर अनेकानेक चर्चाएँ हो सकती हैं, घंटों के विमर्श हो सकते हैं। महाभारत का युद्ध “धर्म” की विजय का प्रतीक है लेकिन, धर्म क्या था इसको परिभाषित कौन करेगा? नीति और धर्म की परिभाषाएँ तो अपने सुविधा अनुसार विजय प्राप्त करने वालों ने परिभाषित की हैं तो ऐसे में सुयोधन को दोषी ठहराने वाले हम कौन? क्या हस्तिनापुर सिंहासन पर पिता धृतराष्ट्र के ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते सुयोधन उसका प्रथम उत्तराधिकारी नहीं था? धृतराष्ट्र ज्येष्ठ थे लेकिन शारीरिक अक्षमता उनकी बाधा बनी, हाँ परंतु धृतराष्ट्र राजा बने तो भी उनका उत्तराधिकारी सुयोधन ही हुआ?
“बोलो गंगापुत्र” – महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह की भूमिका को एक नए परिदृश्य से देखने का प्रयास है। यह लोगों की वैचारिक स्थिति, समझ बूझ और ज्ञान को चुनौती नहीं देती या सही ग़लत के निष्कर्ष के स्थान पर पाठक के बुद्धि विवेक पर निर्णय छोड़ देती है और यही इस पुस्तक का सबसे बड़ा सामर्थ्य है।
भाई पवन लिखते हैं –
“धृतराष्ट्र को उस समय यह कहकर दिलासा दिया गया, कि अभी चाहे उसका अनुज पांडु, हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी है, परंतु अगली पीढ़ी में उसका ही ज्येष्ठ पुत्र इस राजगद्दी पर विराजमान होगा। लेकिन ऐसा न हो सका। इससे न केवल धृतराष्ट्र और दुर्योधन का, बल्कि हस्तिनापुर का भी एक समान अपमान ही हुआ। तो अंत में कोई रास्ता निकालकर यदि दुर्योधन ने पाण्डवों को हस्तिनापुर न देने की बात की, तो उसने मूल रूप से कोई पाप नहीं किया था, क्योंकि नीति के अनुसार हस्तिनापुर पर दुर्योधन का अधिकार बनता था।”
न्याय अन्याय, नीति पर
“राजकुल का एक ही धर्म है, और वह है कि किसी तरह सत्ता को बनाए रखना, तात्पर्य है यह कि राजकुल में सत्य, धर्म नहीं, बल्कि सत्ता ही धर्म है। सत्ता युद्ध को धर्मयुद्ध इसलिए राजकुलों ने कहना शुरू किया ताकि, युद्धोपरांत मिली विजय को न्यायोचित ठहराया जा सके। स्वार्थ राजकुल का प्रमुख गुण है; अहंकार ही उसकी जाति है।”
इस पुस्तक में अध्याय “अंतिम कौरव” में एक प्रश्न का उत्तर मिलता है। कुरु वंश का अंत देवव्रत के साथ ही हो गया क्योंकि पांडव तो कुरु की संतानें थे ही नहीं वह तो वेद व्यास का वंश थे। इसी कारण “कुरुवंश के पितरों में दुर्योधन की स्वीकार्यता युधिष्ठिर से अधिक थी।”
“सत्ता ही सत्य है” – आजकल के परिदृश्य पर एक टीका है।
“दुविधा के पार” – इस अध्याय में मृत्यु शैया पर लेते भीष्म पितामह और भगवान श्रीकृष्ण के बीच हुए संवाद का एक अंश है। ‘‘कर्म के दृष्टिकोण से मैं कहाँ खड़ा हूँ योगेश्वर?’’ भीष्म पुन: अधीर हुए। ‘‘आपने जहाँ चाहा, आप वहीं खड़े हैं पितामह।’’ कृष्ण ने उत्तर दिया। ‘‘इतिहास मुझे कैसे लिखेगा?’’ फिर से वही अधीरता का स्वर उभरा। ‘‘इसकी चिंता है, या जानने की उत्सुकता?’’ कृष्ण ने पूछा। ‘दोनों।’ संक्षिप्त सा उत्तर आया। ‘‘पितामह! इतिहास, लिखने वाले पर निर्भर करता है कि उसने घटना का निरूपण किसी भाव द्वेष में आकर किया या निरपेक्ष भाव से किया है। सत्य को लिखने का साहस और क्षमता कौन कर सकता है? फिर मेरा मन व्यग्र क्यों है मोरमुकुटधारी? अधीरता की पराकाष्ठा थी भीष्म के स्वरों में। ‘‘इसलिए कि आप अपना मूल्यांकन स्वयं कर रहे हैं पितामह। हर व्यक्ति अपना मूल्यांकन स्वयं करता है, और फिर उसकी स्वीकृति बाह्य जगत से चाहता है; यहीं पर उसे व्यग्रता का भान होता है। इस स्वीकृति के लिए व्यक्ति अपनी सारी बुद्धि बल का प्रयोग करता है। यहीं से उसका आत्मविश्वास दरकने लगता है …फिर वह दूसरे के पैरों से चलने की कोशिश करने लगता है, जोकि संभव नही। मनुष्य मात्र की सारी दुविधाओं का मूल कारण यही है पितामह। आप मुझसे स्वीकृति चाहते हैं, किन्तु सहमत स्वयं से भी नही।’’
इस पुस्तक में भीष्म पितामह की मनोस्थिति, दुविधा, काल के साथ संवाद, योगिराज कृष्ण के साथ, वेद व्यास के संवादों को बहुत सुंदर शब्द शैली में कहा है। यह पुस्तक जनमानस के मन पर महाभारत को लेकर एक जिज्ञासा का भाव लाती है और इस दृष्टिकोण को समझ पाने के लिए नए तर्क देती है।
यह पुस्तक किंडल पर, अमेजॉन पर उपलब्ध है और धार्मिक विवेचनाओं वाली पुस्तकों में सम्माननीय स्थान प्राप्त करने योग्य है।
तो मित्रों, आज की चर्चा यहीं तक, कल फिर मिलते हैं किसी नये विषय के साथ। तब तक के लिये जै राम जी की।


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